आंध्रप्रदॆश मॆ भारत कॆ दूसरे क्रमांक के सबसे सूखे जिले में बन रहा है एक आत्मनिर्भर गाँव।

हम ऐसे बहुत लोगों से मिलते होंगे जो घर, विला और एपर्टमेंट्स बनाते होंगे। पर कल्याण अक्किपेडि शायद पहले आदमी होंगे जो एक गाँव का निर्माण कर रहे हैं। इनके द्वारा तैयार किया गया यह गाँव एक आत्मनिर्भर गाँव है। गाँव वालों के उपयोग आने वाली बिजली सौर ऊर्जा तथा पवन चक्की से पैदा होती है, बारिश के जल का संचयन किया जाता है, गाँव वालों के लिए जरुरी खाना गाँव में ही उगाया जाता है। गाँव में घरों के अलावा कुछ छोटी उद्योग इकाइयों तथा हाल ही में एक स्केटबोर्ड पार्क का भी निर्माण किया गया है।

२०१४ में कल्याण ने आंध्र प्रदेश में अनंतपुर जिले के टेकुलोडु गाँव में १२.५ एकड़ बंजर जमीन खरीद कर ‘प्रोटो गाँव’ का निर्माण शुरू किया। यह गाँव भारत के दूसरे क्रम के सबसे सूखे क्षेत्र में स्थित है। कल्याण अपने प्रयासों द्वारा एक ऐसे गाँव का निर्माण कर रहे है जिसमें पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना टिकाऊ संसाधनों के माध्यम से गाँव की बुनियादी आवश्यक्ताओं को पूरी की जा सके।

ग्रामवासी

किसी को भी इस ‘प्रोटो गाँव’ में रहने के लिए व अपना घर बनाने के लिए अन्य ग्रामीणों कि सहायता की आवश्यकता होती है। ‘प्रोटो गाँव’ के बनाने की शुरुआत करने से पहले, २००८ से २०१० तक कल्याणने लगभग २.५ वर्ष तक संपूर्ण भारत में यात्रा की, और २०१० में वह अपनी मूल जगह आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में लौट आए। १६६ गाँवों में यात्रा करने के बाद वे ‘टेकुलोडु’ नामक गाँव में बस गए। टेकुलोडुमें उन्होंने अन्य ग्रामीणों के साथ अच्छा समय बिताया और लगभग १०० दिनों तक १०० परिवारों के सदस्यों से वार्तालाप करने के बाद उन्हें गाँव की आर्थिक स्थिति और स्वास्थ समस्याओं की जानकारी मिली।

इसके बाद, उन्होंने गाँव में एक परिवार को चुना जिनकी वार्षिक आय ६५०० रुपय थी व उनके साथ आने वाले आठ महीनों तक काम करने का तय किया। इस परिवार के साथ बिताए हुए उनके समय के दौरान, उन्होंने उनके साथ उनके खेतों में काम किया और उनकी मासिक आय १४ हजार तक बढ़ाने में उनकी सहायता की।

इस परिवार के साथ की सफलता ने कल्याण को प्रोत्साहित किया जिससे प्रेरणा लेकर कल्याण ने ‘प्रोटो गाँव’ का निर्माण करने का निर्णय लिया। जमीन खरीदने के बाद कल्याण ने गाँव बनाने के लिए गाँव वासियों को अपने साथ जुड़ने का आमंत्रण दिया। टेकुलोडु गाँव के दस परिवार इस नए गाँव में भाग लेने के लिए खुशी से तैयार हो गए। गाँव में रहने वाले सभी लोग गाँव में समान अधिकार रखते है।

गाँव की स्थापना

पानी के तालाब:
केवल स्वयंसेवक बनने से ग्रामजन नहीं बन सकते। इस गाँव के हर एक वासी को ‘श्रमदान’ करना पड़ता है। इस गाँव के भारत के दूसरे क्रमांक के सबसे सूखे क्षेत्र के जिले में होने के कारण कल्याण और ग्रामवासियों ने सबसे पहले जमीन के आस पास तालाब खोदे, जिसमें वर्षा जल एकत्रित हो तथा भूमिगत के जल का स्तर भी ऊँचा हो सके। वर्तमान में, बोरवेल के द्वारा १४० फुट की गहरायी से पानी प्राप्त किया जा सकता है, जो पहले २४० फुट हुआ करता था।

घरों का निर्माण:
प्रोटो गाँव में घरों के निर्माण के लिए बाहर से सिमेंट खरीदने के बजाए, चूना पत्थर तथा बैल द्वारा चलाई जाने वाली भट्टियों का उपयोग करके अपने सिमेंट का उत्पादन किया गया। गाँव की सभी इमारतों को स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्रियों का उपयोग करके बनाया गया है। गाँव के दो घरों का निर्माण मिट्टी, बांस, पत्थर और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग करके किया गया है।

बिजली उत्पादन:

प्रोटो गाँव की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा तथा पवन चक्कियों का उपयोग किया जाता है। कल्याण के एक मित्र ने उन्हें गाँव में पवन चक्की लगाने के लिए मदद की। उसके बाद, पवन चक्की का प्रबंधन तथा रखरखाव करने के लिए ग्रामीणों को प्रशिक्षित किया गया।

जैविक खेती:
कल्याण ने बंजर जमीन खरीदी थी, जिसमें खेती के लिए आवश्यक तत्वों की कमी थी। इस जमीन को कृषि के लिए तैयार करने में लगभग तीन साल लग गए। उन्होंने आसपास हरी वनस्पति लगाने के लिए कई रोपण लगाए। इसके अलावा गाँव वालो ने गाँव में अपने लिए जैविक भोजन पैदा करना शुरू कर दिया है। इस समय, कल्याण “वन एकर्स” नामक अवधारणा पर प्रयोग कर रहे हैं। इस प्रयोग के माध्यम से वे खेती का विकास कर रहे हैं जिसमें किसानों द्वारा विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ उगाई जाती हैं जो किसानों की जरूरतों को पूरा कर सकती है, और अतिरिक्त सब्जियाँ शहर में बेच कर आय में वृद्धि भी की जा सकती है।

**स्थाई व्यवसाय: **

प्रोटो गाँवमें एक ग्रामीण आर्थिक ज़ोन (Rural Economic Zone – REZ) भी बनाया गया है जिसमे साबुन बनाने तथा तेल उत्पादन की इकाइयाँ बनाई गई है। साबुन बनाने के लिए, गाँव में बायोगैस संयंत्र का उपयोग करके गर्मी का उत्पादन होता है। तमाम जैविक अपशिष्ट का उपयोग बायोगैस बनाने में होता है। गाँव में तथा आसपास के शहरों के आगंतुकों में यह साबुन बेचा जाता है। आसपास के गाँवों की महिलाओं को साबुन बनाने के लिए प्रशिक्षित भी किया जाता है। तेल के उत्पादन के लिए वे अपने खेतों में उगाई हुई मूँगफलियों का उपयोग करते है, कभी कभी अन्य गाँवों के किसानो से मूँगफलियाँ खरीदते भी है।

विद्यालय :

गाँव में ‘मायाबाजार’ नाम की जगह में बच्चों को अभ्यास कराया जाता है। कल्याण इसे ‘विद्यालय’ का नाम नहीं देना चाहते, इसलिए उन्होंने ‘मायाबाजार’ नाम चुना जहाँ छात्र इंटर्नेट तथा प्रयोगात्मक तरीकों से सब कुछ सीख सकते हैं। यहाँ शिक्षक केवल तेलुगु व हिंदी भाषा पढ़ाते हैं, तथा बाकी विषय छात्रों को खुद से सीखना होता हैं।

कल्याण कहते है, “अगर कोई हमारी प्रणाली को समझना या अपनाना चाहता हैं तो हमारे प्रयासों के बारे में और जानने के लिए उनका हमारे गाँव में स्वागत है। हम उनसे कोई शुल्क नहीं लेंगे। हम उन लोगों का समर्थन करना चाहते हैं जो हमारी जैसी विधियों को अपने गाँवों में अपनाना चाहते हैं।”

अधिक जानकारी के लिए: http://protovillage.org/

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